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गुरुवार, 9 जून 2022

ग़ज़ल 51 : तुम बिन सूना सूना लगता

 एक ग़ज़ल

22--22--22--22-22--2

तुम बिन सूना-सूना लगता आँगन है
तुम आते हर मौसम लगता सावन है

यूं तो कोई मोल नहीं था जीवन का
तेरे छू लेने भर से यह चंदन है

 जाने क्यों तुझ में  दिल रमता रहता
  तू ही मेरी पूजा ,मेरा वंदन है

  मैंने तो सब कुछ हँसकर तुमसे बाँटा 
 मेरे हिस्से में आई बस खुरचन है 

जैसे टूटे कांचों पर  थिरकन होती 
 वैसे ही जीवन का मेरा नर्तन है

 लिखना चाहूँ तो भी ना लिख पाऊँ मै
 ऐसा गहरा रिश्तों का यह बंधन है

जीवन क्या था, टुकड़ा एक ज़मीं का था
  तुम आए तो महका मन का आँगन है

  अपने माथे पर मैं रोज लगाती हूँ
   धरती माँ का कण-कण मेरा  चंदन है

 अरमानों को जिस ढांचे में ढालो तुम
 ले लेता आकार हमारा बचपन है 

 जीवन भर जो सच का साथ नहीं छोड़े 
 ऐसा सच्चा केवल मेरा दरपन  है


    डॉ अर्चना पाण्डेय

गुरुवार, 20 मई 2021

ग़ज़ल 50

 

ग़ज़ल 50 : पैर नंगे वह चल है

 

2122---2122

पैर नंगे वह चला है

पाँव छाले ,कब रुका है

 

राह बाक़ी ज़िन्दगी की

और कितनी, क्या पता है

 

 वह थका हारा हुआ है

साँस ले लेकर मरा है

 

और उसकी बेबसी को

इस ज़माने ने छला है

 

 जो लदा इतने फलों से

देखिए कितना झुका है

 

छाछ पीता फूँक कर अब

 दूध से शायद जला है

 

अर्चना की ज़िन्दगी यह

है नियामत या बला है

 

सं 12-05-21

 

ग़ज़ल 49

 

ग़ज़ल 49

 

2122–2122–2122

 

याद आता है मुझे चेहरा तुम्हारा,

 मैं जिसे कहती रही चंदा सा प्यारा।

 

 बिन तेरे कितना अधूरा है ये आंगन,

 भूल ना पाएगा तुझको मन हमारा ।

 

 चार दिन की चांदनी वह भी अधूरी,

 पढ रही थी इक अधूरा ख़त तुम्हारा।

 

तुम समझ लोगे मेरी मजबूरियाँ जब,

 जानती हूँ लौट आओगे दुबारा ।

 

अब नहीं चंदा मुझे देता दिलासा ,

 जो कभी तनहाइयों मे था सहारा।

 

 छटपटाती यूँ नहीं, ना डूबती मैं -

 तुम जो मेरा बन गए होते किनारा ।

 

 देखती हूँ टूटते तारे बिखरते  ,

 आसमाँ को जब कभी मैने निहारा

 

 चाहती तो हूं, भला रोकूँ मैं कैसे?

आँख बेबस देखती है बस नज़ारा

 

  पाँव धरती पर नहीं है ‘अर्चना’ के

 जब से मैने  दिल में है तुमको उतारा

 

Corrected 02-05-21

 

 

 

ग़ज़ल 48

 

ग़ज़ल 48 : मतलबी रिश्ता कोई समझा गया

 

2122---2122--212

 

मतलबी रिश्ता कोई समझा गया

आदमी शैतान बन कर आ गया

 

छाँव ठंडी मैं जिसे समझा किया

चिलचिलाती धूप बन कर छा गया

 

ज़िन्दगी थी चार दिन की ही मगर

मुद्दतों का ग़म मुझे तड़पा गया

 

प्यार की कीमत लगा बाज़ार में

इश्क़ था जो हासिए पर आ गया

 

तोड़ कर बन्धन कोई जब ’अर्चना’

एक परिभाषा नई बतला गया

 

सं 12-05-21

 

ग़ज़ल 47

 

ग़ज़ल 47 : अपने हिस्से की भी ज़िन्दगी—

 

212---212---212---212

 

अपने हिस्से की भी ज़िन्दगी तो जियो

हर समय दूसरो का जहर  ना पियो

 

कौन किसका हुआ है यहाँ भीड़ में

बस अकेले ही चलना यहाँ ,साथियो !

 

यह न सोचो कि कया सब कहेंगे तुम्हें

ज़िन्दगी का मधुर रस सदा तुम पियो

 

इस कदर लोग बढ़ने लगे होड़ में

हो गया चाक दामन तो फिर से सियो

 

बच गए तो सभी साथ होंगे कभी

इस ’करोनासे पहले बचो, भाइयो !

 

सच के हक़ में खड़ी है सदा ’अर्चना’

सर झुका कर नहीं, सर उठा कर जियो

 

सं 12-05-21


 

ग़ज़ल 46

 

ग़ज़ल 46  : एक रिश्ता है तुमसे---

 

2122—1212—112/22

तुम से रिश्ता बहुत पुराना है

जिन्दगी भर जिसे निभाना है

 

कोई मेरा न आशियाना है

तेरा दर ही मिरा ठिकाना है

 

चाह मिलने की है बहुत तुम से

चाहतों का सफर सजाना है

 

कोई तुझ-सा न मीत दुनिया में

राज़ दिल का तुम्हें बताना है

 

रूप तेरा यहाँ वहाँ देखूँ

एक जीने का बस बहाना है

 

रोज़ सुनते हैं गीत जीवन के

रोज़ सुनना है भूल जाना है

 

सं 09-05-21

ग़ज़ल 45

 

ग़ज़ल 45 देहरी पर दिए जगमगाने लगे---

 

212---212---212—212

 

दीप देहरी पे हैं जगमगाने लगे

गीत खुशियों के हम आज गाने लगे

 

तुम उधर स्नेह दीपक जलाते रहे

हम इधर प्रेम- दीपक जलाने लगे

 

आज दीपावली की सुखद रात है 

जो भी रिश्ते थे रूठे मनाने लगे

 

आसमाँ ने सजाए सितारे उधर

हम जमीं पर सितारे सजाने लगे

 

आज गुझिया बनी,साथ मठरी बनी

मालपूए, मिठाई सुहाने लगे

 

पुष्प अक्षत लिए हाथ में ’अर्चना’

थाल में स्वस्तिका श्री बनाने लगे

 

सं 10-05-21

ग़ज़ल 44

 

ग़ज़ल 44 : जल्दबाजी में दरख़्तों को---

 

जल्दबाजी में दरख़्तों को न यूँ तुम  छाँटते

तो घनी छाया में हम तुम दर्द अपना बाँटते

 

कद तुम्हारा दोस्ती के कद से ऊँचा हो गया

वरना हम तुमको कभी उस प्यार से फिर डाँटते

 

धूल में चंदा भी अब दिखता कहाँ छत पर कभी

आसमां खाली कहाँ सपने जो अपने  टाँकते

 

दूरियाँ बढ़ती ही जाती हैं करूँ कोशिश कई

थक न जाऊं मैं विवादों को ही केवल ढाँपते


 

ग़ज़ल 43

 

 

ग़ज़ल 43 : पैर मेरे महावर की---

 

पैर मेरे महावार की लाली रहे

और पग पग सजी हरियाली रहे

 

संग सीता रहे संग गौरा रहे

गीत गाऊं सदा संग आली रहे

 

सलवटों में न गुज़रे कभी जिन्दगी

शाम सबके घरों मे दिवाली रहे

 

आज अंबे की पूजा करे अर्चना

मेरा आँचल कभी भी न ख़ाली रहे

 

 

ग़ज़ल 42

 

ग़ज़ल 42

 

212----212-----212-----212

तुमको लगता है उल्फत में कुछ ग़म नहीं,

या नज़ाकत है, इसमें कोई दम नहीं ?

 

खत्म होने को है स्याह सी ज़िन्दगी

 रोशनी का यह आलम भी कुछ कम नहीं 

 

पेंच-ओ-ख़म है बहुत इश्क़ की राह में

ये मुहब्बत किसी रोग से कम नहीं 

 

लोग कहने लगे” बेसबब बेवफ़ा

बेवफा और होंगे मगर हम नहीं ।

 

सिलसिला इश्क का साँस जब तक रहे

साथ मैं छोड दूँ मैं वो हमदम नहीं

 

रोज़ ढाता है मुझ पे जमाना सितम

’अर्चना’ की हुई आंख तो नम नहीं

 

सं 11-05-21

ग़ज़ल 41

 

ग़ज़ल 41: चन्द धागों के रिश्ते---

212---212---212-----212-

 

आज रिश्ते सभी दर ब दर हो गए

आज अपने सभी बेखबर हो गए

 

याद राखी दिलाती है बातें वही = याद राखी की आती है

सोच कर अब जिन्हें बेअसर हो गए = कल के वादे आज बेअसर ह

 

अंजुमन में कभी कद्र अपनी भी थी

इन अदीबों में हम बे कदर हो गए

 

चढ़ रही थी ग़ज़ल यह किसी ताज पर

उनकी नजरों में हम बे बहर हो गए

 

गुम्बजों से तो पहचान थी ही नहीं

गम है बुनियाद भी बे अदब हो गए

 

बुधवार, 19 मई 2021

ग़ज़ल 40

 

ग़ज़ल 40 : घर के आँगन में ---

 

घर के आंगन में तुलसी श्रृंगार होती है

 बेटी तो इस धरती का उपहार होती है

 

 चंदन जैसी रहे महकती जहां कहीं वो जाए

संबंधों में धुरी बनी किरदार होती है

 

 उसकी परिधि में आ जाए जग के सारे काम

 घर, दफ्तर के बाहर भी दमदार होती है

 

 प्रेम त्याग बलिदान चढ़ाकर करती जीवन अर्पण

इस समाज की सुदृढ़, सूत्रधार होती है

 

 सौ तारों में एक चंद्र सी जगमग है उसकी छवि

हर उड़ान की यह गुड़िया हकदार होती है

 

सागर से अंबर तक उसने अपने पंख पसारे

इसके हाथों उन्नत यह पतवार होती है

 

नए क्षितिज की और प्रगत होती है नारी अविरल

 रीत प्रीत संग सजती बंदनवार होती है

 

ग़ज़ल 39

 

ग़ज़ल 39 : इस तरह कुछ प्यार से---

 

2122-----2122---2122

इस तरह कुछ प्यार से मिलना पड़ेगा

 फ़र्श को भी अर्श तक चलना पड़ेगा

 

बन नहीं सकता महल बस सोचने से

 ईंट बन बन कर तुम्हें लना पड़ेगा

 

पेड़ पर सोना नहीं उगता है, प्यारे !

आग में दिन रात तो जलना पड़ेगा

 

 जब मुहब्बत चाक कर देती कलेजा

जख्म अपने हाथ से सिलना पड़ेगा

 

रोकने से कब रुका कोई फितूरी

आफताबों को नहीं ढलना पड़ेगा

 

 

क़ाफ़िया – ग़लना—छलना--


 

ग़ज़ल 38

 

ग़ज़ल 38 : चाँद जब जब आसमाँ पर

 

2122—2122—212

चाँद जब जब आसमाँ पर आएगा

जानती हूँ रात भर तड़पाएगा

 

ढूँढने को दिल मेरा बेताब जब

बादलों की ओट में छुप जाएगा

 

दर्द मेरा हो जमाने का सही

गीत बन कर अश्क़ में ढल जाएगा

 

चाँद कब देगा दिलासा प्यार का

आग पर वह आग ही बरसाएगा

 

एक दिन पाती उसे मिल जायेगी

आस का दीपक न बुझने पाएगा

 

जो गया फिर कौन लौटा ’अर्चना’

वह भला क्यों लौट कर फिर आएगा

 

सं 10-05-21

 

 

ग़ज़ल 37

 

ग़ज़ल 37  : माँ की आँखों में ---

2122---1212---22

 

मां की आंखों में पल रही गुड़िया

क्यों  जमाने को खल रही गुड़िया ?

 

अपने ऊपर यक़ीन है उसको

एक बला सी पल रही गुड़िया

 

खुद को ही खोजने चली लेकिन

क़ैद में है किसी महल गुडिया

 

 चलने वालों को ही मिली मंज़िल

रुक नहीं, रोज यूं ही चल गुड़िया

 

हौसला और आस रख दिल में

 धीरता ही तेरा है बल गुड़िया

 

 सब के हाथों न बन खिलौना तू

 आज में देख अपना कल गुडिया

 

 ’अर्चना’ सोच में इधर डूबी

आग में क्यों उधर जली गुड़िया

 

सं 09-05-21

 

 

 

 

 

ग़ज़ल 36

 

ग़ज़ल 36 : बिना ढलान के झरना---

1212--1122--1212---22  [ पर बाँधा जाए ]

बिन ढलान/ के झरना को/ई कहाँ बहा होता

रिश्तों में भी प्यार मोहोब्बत कहाँ रहा होता

 

बागों के पौधों की जड़ का पता नहीं

गमले के पौधे की जड़ क्या नाप रहा

 

चोरों के सरदार कई मिल जाएंगे

प्यार निभाने वालों का अब कहाँ पता

 

सबसे हमको खूब शिकायत रहती है

एक बात में बरसों का नाता ढहा

 

सबको अपनी अस्मत प्यारी होती है

मौका मिलते ही तूने भी खूब कहा

 

तू इतना मजबूत बना हर रिश्ते को

छोटी तकरारों से न हो जाए हवा

 

[ मुज्तस मुसम्मन मख़्बून  महजूफ़ ]

12   12/ 1122      /1212   /22

बिना ढलान के झरना / बहा कहाँ कोई

 


 

ग़ज़ल 35

 

ग़ज़ल 35: तीरगी का ये कबतक

 

212—212---212---212

तीरगी का ये कब तक रहेगा असर?

रोशनी से सजाएं चलो यह शहर

 

जल है जीवन हमारा ,न दूषित करें,

लोग जाने हो क्यों आज तक बेख़बर

 

सोचना है नई पीढ़ियों के लिए ,

कारखाने उगलने लगे अब ज़हर ।

 

धूप देखो कहाँ से कहाँ चढ़ गई

जाग जाओ हुई जाने कब की सहर

 

रुकना मंज़िल से पहले गवारा नहीं

राह आगे की जितनी भी हो पुरख़तर

 

सं 02-05-2021