बुधवार, 19 मई 2021

ग़ज़ल 40

 

ग़ज़ल 40 : घर के आँगन में ---

 

घर के आंगन में तुलसी श्रृंगार होती है

 बेटी तो इस धरती का उपहार होती है

 

 चंदन जैसी रहे महकती जहां कहीं वो जाए

संबंधों में धुरी बनी किरदार होती है

 

 उसकी परिधि में आ जाए जग के सारे काम

 घर, दफ्तर के बाहर भी दमदार होती है

 

 प्रेम त्याग बलिदान चढ़ाकर करती जीवन अर्पण

इस समाज की सुदृढ़, सूत्रधार होती है

 

 सौ तारों में एक चंद्र सी जगमग है उसकी छवि

हर उड़ान की यह गुड़िया हकदार होती है

 

सागर से अंबर तक उसने अपने पंख पसारे

इसके हाथों उन्नत यह पतवार होती है

 

नए क्षितिज की और प्रगत होती है नारी अविरल

 रीत प्रीत संग सजती बंदनवार होती है

 

ग़ज़ल 39

 

ग़ज़ल 39 : इस तरह कुछ प्यार से---

 

2122-----2122---2122

इस तरह कुछ प्यार से मिलना पड़ेगा

 फ़र्श को भी अर्श तक चलना पड़ेगा

 

बन नहीं सकता महल बस सोचने से

 ईंट बन बन कर तुम्हें ढलना पड़ेगा

 

पेड़ पर सोना नहीं उगता है, प्यारे !

आग में दिन रात तो जलना पड़ेगा

 

 जब मुहब्बत चाक कर देती कलेजा

जख्म अपने हाथ से सिलना पड़ेगा

 

रोकने से कब रुका कोई फितूरी

आफताबों को नहीं ढलना पड़ेगा

 

 

क़ाफ़िया – ग़लना—छलना--


 

ग़ज़ल 38

 

ग़ज़ल 38 : चाँद जब जब आसमाँ पर

 

2122—2122—212

चाँद जब जब आसमाँ पर आएगा

जानती हूँ रात भर तड़पाएगा

 

ढूँढने को दिल मेरा बेताब जब

बादलों की ओट में छुप जाएगा

 

दर्द मेरा हो जमाने का सही

गीत बन कर अश्क़ में ढल जाएगा

 

चाँद कब देगा दिलासा प्यार का

आग पर वह आग ही बरसाएगा

 

एक दिन पाती उसे मिल जायेगी

आस का दीपक न बुझने पाएगा

 

जो गया फिर कौन लौटा ’अर्चना’

वह भला क्यों लौट कर फिर आएगा

 

सं 10-05-21