बुधवार, 19 मई 2021

ग़ज़ल 35

 

ग़ज़ल 35: तीरगी का ये कबतक

 

212—212---212---212

तीरगी का ये कब तक रहेगा असर?

रोशनी से सजाएं चलो यह शहर ।

 

जल है जीवन हमारा ,न दूषित करें,

लोग जाने हो क्यों आज तक बेख़बर।

 

सोचना है नई पीढ़ियों के लिए ,

कारखाने उगलने लगे अब ज़हर ।

 

धूप देखो कहाँ से कहाँ चढ़ गई

जाग जाओ हुई जाने कब की सहर

 

रुकना मंज़िल से पहले गवारा नहीं

राह आगे की जितनी भी हो पुरख़तर

 

सं 02-05-2021

 

ग़ज़ल 34

 ग़ज़ल 34 : जाने क्यों आज ---

2122---1212---112/22

 

आज जाने क्यों मुस्कराई मैं ,

याद आए वो, फिर लजाई मैं ।

 

मेरे पहलू में ही वो बैठे थे,

उनको मुड़कर न देख पाई मैं ।

 

उनकी नज़रें भी ढूंढती होंगी,

खुद से खुद को रही छुपाई मैं ।

 

दूर रह कर भी पास थे गोया

फ़ासिले कब भला मिटाई मैं 

 

जब कभी सामना हुआ उनसे

मन में इक ईद सी मनाई मै

 

”अर्चना’ इश्क़ में खबर ही कहाँ

क्या कहे थे वो सुन न पाई मैं

 

सं 08-05-21

ग़ज़ल 33

 

ग़ज़ल 33:   तुम्हें मन में बसाना –

 

1222----1222---1222—122

तुम्हें मन में बसाना चाहती हूँ

तुम्हें अपना बनाना चाहती हूँ

 

तड़पती हूँ बिना जल मीन जैसे

तुम्हारे पास आना चाहती हूँ

 

नहीं जीना मुझे मर मर के,  जानम !

तुम्हें सपनों में पाना चाहती हूँ

 

न बातें दिल की रह जाए अधूरी

मैं अपना ग़म सुनाना चाह्ती हूँ

 

तेरी तस्वीर सीने में बसी है

उसे जग से छुपाना चाहती हूँ

 

न तुमको है भरोसा अर्चना पर

यकीं मर कर दिखाना चाहती हूँ

 

सं 10-05-21